धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक समर्पण जब एक साथ मिलते हैं, तो एक दिव्य वातावरण का निर्माण होता है। झारखंड के पवित्र शहर देवघर के समीप स्थित सिरसा, त्रिकुटी में कुछ ऐसा ही अद्भुत दृश्य देखने को मिला — जहां दुर्गा पूजा का सातवां वर्ष शक्ति, भक्ति और प्रकृति के संगम का प्रतीक बन गया।
सात वर्षों की आस्था: त्रिकूटांचल दुर्गा पूजा का गौरवपूर्ण अध्याय
इस वर्ष त्रिकूटांचल दुर्गा पूजा ने अपने सातवें वर्ष में प्रवेश किया, और हर वर्ष की तरह इस बार भी श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। पूजा का आयोजन प्रकृति की गोद में, त्रिकूट की शांत और आध्यात्मिक वादियों के बीच हुआ — जहां हर श्वास में भक्ति और हर धड़कन में माँ दुर्गा का नाम गूंजता प्रतीत होता है।
यह पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकत्रीकरण बन चुका है, जिसमें आस-पास के गांवों, कस्बों और यहां तक कि अन्य राज्यों से भी भक्त सम्मिलित होते हैं।
मुख्य पुजारी: दीपक भारद्वाज मठपति और आचार्य सुनील मिश्रा (महाराजजी)
पूरे अनुष्ठान की धार्मिक विधि-विधान का संचालन किया, मुख्य पुजारी दीपक भारद्वाज मठपति जी ने। उनके सटीक मंत्रोच्चारण, शास्त्रीय ज्ञान और साधना की गहराई ने पूजा में दिव्यता की अनुभूति कराई।
उनके साथ वैदिक आचार्य सुनील मिश्रा जी (महाराजजी) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों विद्वानों की जोड़ी ने न केवल पूजा की परंपरा को जीवंत किया, बल्कि श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और मार्गदर्शन भी प्रदान किया।
प्रकृति और अध्यात्म का मिलन
देवघर वैसे भी बाबा बैद्यनाथधाम के कारण विश्वविख्यात है, लेकिन त्रिकूटांचल दुर्गा पूजा इस शहर को एक नई धार्मिक पहचान भी दे रही है। पर्वतों की शांत छाया, पेड़ों की सरसराहट और मंद बहती हवा के बीच माँ दुर्गा की स्थापना का अनुभव प्रकृति और अध्यात्म के अद्भुत संगम जैसा था।
यह पूजा उन लोगों के लिए विशेष रही जो शहरी शोरगुल से दूर, प्रकृति की गोद में रहकर माँ दुर्गा की भक्ति में लीन होना चाहते हैं।
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एकता, संस्कृति और सेवा का संदेश
त्रिकूटांचल दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रही। यहां सामूहिक भंडारे, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक सेवा कार्यों ने यह साबित किया कि यह आयोजन समाज को जोड़ने वाला एक मजबूत मंच है।
यह पर्व स्थानीय युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठों को एक साथ लाकर एक ऐसा अवसर देता है, जहां सांस्कृतिक मूल्यों का आदान-प्रदान, सेवा का भाव और आपसी सहयोग की भावना पनपती है।
पर्व नहीं, एक प्रेरणा
त्रिकूटांचल दुर्गा पूजा आज केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन गई है — एक ऐसा उदाहरण जहां धर्म, प्रकृति और समाज का संतुलन दिखाई देता है। सात वर्षों की यह यात्रा न केवल आयोजकों की मेहनत का प्रमाण है, बल्कि उन श्रद्धालुओं की आस्था का भी सम्मान है, जो हर वर्ष यहां आकर माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करते हैं।

